Monday, September 13, 2021
Wednesday, August 25, 2021
इज्जत
मैं
जिन्दा हूं
ऐसे समाज में
जहां
औरत की ऊंची आवाज से ,
लग जाती है ,हर की इज्ज़त दांव पर ।
वहीं
मर्द
बक सकता है
चौराहे पर खड़ा होकर
मां , बहिन के नाम की गालियां ।
प्रियंका चौधरी परलीका
21/08/2021
Saturday, March 20, 2021
विश्व काव्य दिवस
वर्तमान जब इतिहास बनेगा ।
इतिहासकार को नहीं भटकना होगा ।
इतिहास को लिखने के लिए
वर्तमान परिस्थितियों को दर्ज करने के लिए।
तथ्य और साक्ष्य जुटाने के लिए
ना ही करनी पड़ेगी खुदाई ।
इतिहासकार
पुस्तकालय में जाकर
उठा लेगा कविताओं की किताबें
जिसमें
वर्तमान के कवि ने
लिख दी
अपनी भूख
अपनी व्यथा
अपनी मुहब्बत
अपनी संस्कृति
अपनी रिवाज
कविता
अपने अंदर
छुपाये रखती है
वर्तमान कि तमाम परिस्थिति
जो
भविष्य का इतिहास बनेगी।।
Saturday, January 30, 2021
किसान आंदोलन
वो किसानों को मारेंगे तुम चुप रहना क्योंकि तुम किसान नहीं हो ।
वो विद्यार्थी वर्ग को कुचलेंगे तुम चुप रहना क्योंकि तुम विद्यार्थी नहीं हो ।
वो नौकरीपेशा की जेब काट लेंगे तुम चुप रहना क्योंकि तुम तो नौकरी में नहीं , खुद का व्यवसाय करते हो ।
वो छोटे छोटे व्यापारियों को दबोचने का षड्यंत्र रचेगे तुम चुप रहना क्योंकी तुम इस श्रेणी के नहीं हो ।
Monday, January 4, 2021
31दिसम्बर
अगस्त के महिने के
तीसरे गुरुवार की दोपहर
मूसलाधार बारिश में भीगता हुआ
वो मेरी दहलीज पर आया था ।
मुझसे विदा लेने ...
फिर आने का वादा करके।
इंतजार करना
मैं लौटकर आऊंगा
दिसम्बर के अंतिम सप्ताह।
मैं,वो,मेरी धड़कन और बारिश
गवाह है हमारी अंतिम मुलाकात की ...
उसके वादें की.....
सदी के सोलहवें वर्ष,
अगस्त के तीसरे गुरुवार की दोपहर ...
किया जो वादा उसने, मुझसे
दिसम्बर के अंत में लौट आने का,
तब से इंतजार जारी है मेरा,
दिसम्बर के अंतिम सप्ताह का।
आज फिर उसका वादा झूठा निकला ।
मैं खड़ी हूं,
घर की छत पर,
इक्कीसवीं सदी के बीसवें वर्ष की
अंतिम संध्या को...
डूबता सूरज देख रही हूं
दिसम्बर की अंतिम तारीख का
सूरज के साथ ही डूब रहा मेरा इंतजार
जो शुरू हुआ था
सदी के सोलहवें वर्ष की
अगस्त के तीसरे गुरुवार को
जो चलता रहा
सदी के बीसवें वर्ष के
दिसम्बर के अंतिम गुरुवार तक ।
प्रियंका चौधरी
समझदार
⭕
तुम बहुत समझदार हो ...
हर परिस्थिति का सामना कर सकती हो ।
जब भी ,कोई ये कहता है ,
धीरे से
मेरी प्रशंसा में ।
मुझे अंदाजा हो जाता है ,
कोई समझौता मेरी दहलीज पर आ गया है ।
इतिहास गवाह है ,
हर लड़की को
प्रशंसा करके ही पराजित किया जाता है ।
प्रियंका चौधरी
ह्रदय
बंजर धरती के
सीने पर
अंकुरित होता है
बेमौसम कोई बीज
ठिक
उसी तरह
तुम आना
बिना उम्मीद
बिना संदेश
बिना आहट के
मेरे हृदय की बंजर धरा पर
मुहब्बत का अंकुर खिलाने ।❤️
प्रियंका चौधरी
Thursday, December 31, 2020
अलविदा 2020
अगस्त के महिने के
तीसरे गुरुवार की दोपहर
मूसलाधार बारिश में भीगता हुआ
वो मेरी दहलीज पर आया था ।
मुझसे विदा लेने ...
फिर आने का वादा करके।
इंतजार करना
मैं लौटकर आऊंगा
दिसम्बर के अंतिम सप्ताह।
मैं,वो,मेरी धड़कन और बारिश
गवाह है हमारी अंतिम मुलाकात की ...
उसके वादें की.....
सदी के सोलहवें वर्ष,
अगस्त के तीसरे गुरुवार की दोपहर ...
किया जो वादा उसने, मुझसे
दिसम्बर के अंत में लौट आने का,
तब से इंतजार जारी है मेरा,
दिसम्बर के अंतिम सप्ताह का।
आज फिर उसका वादा झूठा निकला ।
मैं खड़ी हूं,
घर की छत पर,
इक्कीसवीं सदी के बीसवें वर्ष की
अंतिम संध्या को...
डूबता सूरज देख रही हूं
दिसम्बर की अंतिम तारीख का
सूरज के साथ ही डूब रहा मेरा इंतजार
जो शुरू हुआ था
सदी के सोलहवें वर्ष की
अगस्त के तीसरे गुरुवार को
जो चलता रहा
सदी के बीसवें वर्ष के
दिसम्बर के अंतिम गुरुवार तक ।
प्रियंका चौधरी
Wednesday, December 23, 2020
लम्बी रात
इक्कीस दिसम्बर की रात
साल की सबसे बड़ी
रात है,
ये भूगोल कहता है ।
इश्क की रातें ,
तुम्हारी इक्कीस की,
रात से कहीं बड़ी होती है ।
भूगोल कह रहा है
आज
दस घण्टे अठारह मिनट का दिन
तेरह घण्टे बयालीस मिनट की रात होगी ।
आज साल की सबसे बड़ी रात होगी ।
शिशिर ऋतु के स्वागत के साथ
सूर्य उत्तरायण होगा ।
तुम्हारे
भूगोल से अलग,
इश्क का भूगोल है।
जहां सूर्य उत्तरायण ,
दक्षिणायन से दूर ।
टिका होता है इंतजार पर ।
जहां रातें हमेशा लम्बी ,
दिन के उजाले में
सूर्य ,चन्द्रमा लगता है ।
इश्क में डूबा आशिक
सूर्य को मानकर चन्द्रमा
देखता है महबूब का चेहरा ।
इश्क का भूगोल
तुम्हारे भूगोल से अलग होता है।
प्रियंका_चौधरी
Friday, December 11, 2020
भाषा
मुझे आती है
सिर्फ
इश्क और इंकलाब की भाषा ।
तुम मुझसे
इश्क में बात करो
या
इंकलाब में ।
मुझे नहीं आती
नफरत के ढे़र पर बैठकर
जाति, धर्म की बातें करना ।
मुझे आती है
इश्क या इंकलाब की भाषा ।
प्रियंका चौधरी
11/12/2020
Tuesday, September 29, 2020
बेटी
बेटी - कविता
स्वर्ण या दलित नहीं होती,
बेटी
गरीब या अमीर नहीं होती।
स्वर्ण और दलित
अमीर और गरीब
आदमी की सोच होती है
जिससे इस समाज का निर्माण हुआ है।
बेटी का कोई जाति, धर्म नहीं होता।
जो छोड़ आती है अपने जन्म का घर,
जाति, धर्म और अपने नाम के साथ।
जो अब तक उसकी पहचान थी।
ना बेटी कमजोर है
ना ही अबला
कमजोर तो है
समाज की सोच
जो बेटी की ताकत को
ना तो समझ पाई
और ना ही
पचा पाई।
अन्याय का शिकार होती आई है,
फिर भी मर्दों को जन्म देती आई है
घृणा है मुझे
समाज के हर उस कीड़े से
समाज की उस मानसिकता से
जो स्त्री को सिर्फ
वासना समझकर इस्तेमाल करता है।
- प्रियंका बैनीवाल
30/09/2020
Subscribe to:
Posts (Atom)
-
अगस्त के महिने के तीसरे गुरुवार की दोपहर मूसलाधार बारिश में भीगता हुआ वो मेरी दहलीज पर आया था । मुझसे विदा लेने ... फिर आने का वादा करके। इं...
